Sunday, December 28, 2014

सुपरस्टार राजेश खन्ना को खून से खत लिखती थी लड़कियां

बॉलीवुड में ऐसा स्टार भी हुआ जिसके लिए लड़कियां इतनी दीवानी थी कि अपने खून से मांग भर लिया करती थी। उसके प्यार में खून से खत लिखा करती थी। ऐसे ही थे आराधना से स्टारडम पाने वाले राजेश खन्ना। सत्तर के दशक में हिंदी फिल्म जगत में अपने अभिनय से लोगों को दीवाना बनाने वाले राजेश खन्ना पहले ऐसे अभिनेता के तौर पर सामने आये, जिन्हें दर्शकों ने सुपर स्टार की उपाधि दी। तो आइए आज बात करते हैं ऐसे सुपर स्टार से जुड़े कुछ रोचक पहलूओं पर  
     
पंजाब के अमृतसर में 29 दिसंबर 1942 को जन्में जतिन खन्ना उर्फ राजेश खन्ना का बचपन के दिनों से ही रूझान फिल्मों की और था और वह अभिनेता बनना चाहते थे हांलाकि उनके पिता इस बात के सख्त खिलाफ थे।
     
राजेश खन्ना अपने कैरियर के शुरूआती दौर में रंगमंच से जुड़े और बाद में उन्होंने यूनाईटेड प्रोड्यूसर एसोसिएशेन द्वारा आयोजित ऑल इंडिया टैलेंट कान्टेस्ट में भाग लिया। जिसमें वह पहले स्थान पर रहे। राजेश खन्ना ने अपने फिल्मी कैरियर की शुरूआत 1966 में चेतन आंनद की फिल्म "आखिरी खत" से की।
       
लेकिन इसके बावजूद उन्हें वह पहचान नहीं मिली जो वह चाहते थे। 1966 से 1969 तक राजेश खन्ना फिल्म इंडस्ट्री मे अपनी जगह बनाने के लिये संघर्ष करते रहे। लेकिन भाग्य को कुछ और मंजूर था। ईश्वर ने तो बाबू मोशाय के लिए आसमां का सितारा बनाना सोच रखा था। तो बस उन्हें मिले शक्ति सामंत और रुपहले पर्दे आई फिल्म आराधना। यही वो फिल्म थी जिससे बॉलीवुड को अपना पहला सुपर स्टार मिला। बेहतरीन गीत, संगीत और अभिनय से सजी इस फिल्म की गोल्डन जुबली कामयाबी ने राजेश खन्ना को सुपर स्टार के रूप में स्थापित कर दिया।  

फिल्म अराधना की सफलता के बाद अभिनेता राजेश खन्ना शक्ति सामंत के प्रिय अभिनेता बन गये। बाद में उन्होंने राजेश खन्ना को कई फिल्मों में काम करने का मौका दिया। इनमें कटी पतंग, अमर प्रेम, अनुराग, अजनबी, अनुरोध और आवाज आदि शामिल है।
         
फिल्म आराधना की सफलता के बाद राजेश खन्ना की छवि रोमांटिक हीरो के रूप में बन गयी। इस फिल्म के बाद निर्माता निर्देशकों ने अधिकतर फिल्मों में उनकी रूमानी छवि को भुनाया। निर्माताओं ने उन्हें एक कहानी के नायक के तौर पर पेश किया, जो प्रेम प्रसंग पर आधारित फिल्में होती थी। सत्तर के दशक में राजेश खन्ना लोकप्रियता के शिखर पर जा पहुंचे और उन्हें हिंदी फिल्म जगत के पहले सुपरस्टार होने का गौरव प्राप्त हुआ। यूं तो उनके अभिनय के कायल सभी थे लेकिन खासतौर पर युवतियों के बीच उनका क्रेज कुछ ज्यादा ही दिखाई दिया।
     
एक बार का वाक्या है जब राजेश खन्ना बीमार पड़े तो दिल्ली के कॉलेज की कुछ लड़कियों ने उनके पोस्टर पर बर्फ की थैली रखकर उनकी सिकाई शुरू कर दी ताकि उनका बुखार जल्द उतर जाये। इतना ही नहीं लड़कियां उनकी इस कदर दीवानी थी कि उन्हें अपने खून से प्रेम पत्र लिखा करती थी और उससे ही अपनी मांग भर लिया करती थी।

राजेश खन्ना की आनंद ऐसी फिल्म थी जिसने इस अभिनेता को नई ऊंचाइयां दी। यह फिल्म आई थी 1971 में। ऋषिकेश मुखर्जी निदेर्शित इस फिल्म में राजेश खन्ना बिल्कुल नये अंदाज में देखे गये। फिल्म के एक दृश्य में राजेश खन्ना का बोला गया यह संवाद बाबू मोशाय हम सब रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिसकी डोर ऊपर वाले की उंगलियों से बंधी हुई है कौन कब, किसकी, डोर खिंच जाये ये कोई नही बता सकता। उन दिनों सिने दर्शको के बीच काफी लोकप्रिय हुआ था और आज भी सिने दर्शक उसे नहीं भूल पाये।
       
सत्तर के दशक में राजेश खन्ना पर यह आरोप लगने लगे कि वह केवल रूमानी भूमिका ही निभा सकते हैं। राजेश खन्ना को इस छवि से बाहर निकालने में निर्माता, निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी ने मदद की और उन्हें लेकर 1972 में फिल्म बावर्ची जैसी हास्य से भरपूर फिल्म का निर्माण किया और सबको आश्चर्यचकित कर दिया।
   
वर्ष 1969 से 1976 के बीच कामयाबी के सुनहरे दौर में राजेश खन्ना ने जिन फिल्मों में काम किया उनमें अधिकांश फिल्में हिट साबित हुयी लेकिन अमिताभ बच्चन के आगमन के बाद परदे पर रोमांस का जादू जगाने वाले इस अभिनेता से दर्शकों ने मुंह मोड़ लिया और उनकी फिल्में असफल होने लगी।
     
अभिनय मे आयी एक रुपता से बचने और स्वंय को चरित्र अभिनेता के रूप मे भी स्थापित करने के लिये और दर्शकों का प्यार फिर से पाने के लिये राजेश खन्ना ने अस्सी के दशक से खुद को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इसमें 1980 में प्रदर्शित फिल्म रेडरोज खास तौर पर उल्लेखनीय है। फिल्म में राजेश खन्ना ने नकारात्मक किरदार निभाकर दर्शकों को रोमांचित कर दिया।

1985 में प्रदर्शित फिल्म अलग-अलग के जरिये राजेश खन्ना ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रख दिया। राजेश खन्ना के सिने करियर में उनकी जोड़ी अभिनेत्री मुमताज और शर्मिला टैगोर के साथ काफी पसंद की गयी।
       
राजेश खन्ना को उनके सिने कैरियर में तीन बार फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। फिल्मों में अनेक भूमिकाएं निभाने के बाद राजेश खन्ना समाज सेवा के लिए राजनीति में भी कदम रखा और वर्ष 1991 में कांग्रेस के टिकट पर न्यू दिल्ली की लोकसभा सीट से चुने गए।
     
राजेश खन्ना ने अपने चार दशक लंबे सिने कैरियर में लगभग 125 फिल्मों में काम किया। उनकी कुछ अन्य उल्लेखनीय फिल्में हैं। दो रास्ते, सच्चा झूठा, आन मिलो सजना, अंदाज, दुश्मन, अपना देश,  आप की कसम, प्रेम कहानी, सफर, दाग, खामोशी, इत्तेफाक,महबूब की मेंहदी, मर्यादा, अंदाज, नमक हराम, रोटी, महबूबा, कुदरत, दर्द, राजपूत, धर्मकांटा, सौतन, अवतार, अगर तुम ना होते, आखिर क्यों, अमृत, स्वर्ग, खुदाई आ अब लौट चले आदि। अपने रोमांस के जादू से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करने वाले किंग आफ रोमांस पिछले वर्ष 18 जुलाई को इस दुनिया को अलविदा कह गये।   

Saturday, December 27, 2014

ऐसी थी खूबसूरती की मल्लिका मधुबाला

अजय शर्मा
   
बॉलीवुड में मधुबाला को एक ऐसी अभिनेत्री के रूप में याद किया जाता। जिन्होंने अपनी दिलकश अदाओं और दमदार अभिनय से लगभग चार दशक तक सिने प्रेमियों का भरपूर मनोरंजन किया।
     
मधुबाला का मूल नाम मुमताज बेगम देहलवी था और जन्म हुआ था दिल्ली में 14 फरवरी 1933 को। उनके पिता अताउल्लाह खान में रिक्शा चलाया करते थे। तभी उनकी मुलाकात एक नजूमी (भविष्यवक्ता) कश्मीर वाले बाबा से हुयी जिन्होंने भविष्यवाणी की कि मधुबाला बडी होकर बहुत शोहरत पाएगी। इस भविष्यवाणी को अताउल्लाह खान ने गंभीरता से लिया और वह मधुबाला को लेकर मुंबई आ गये।
   
वर्ष 1942 में मधुबाला को बतौर बाल कलाकार (बेबी मुमताज) के नाम से फिल्म बसंत में काम करने का मौका मिला। बेबी मुमताज के सौंदर्य से अभिनेत्री देविका रानी काफी मुग्ध हुयी और उन्होंने उन्हें मधुबाला नाम रखने की सलाह दी। उन्होंने मधुबाला से बॉम्बे टाकीज की फिल्म "ज्वार भाटा" में दिलीप कुमार के साथ काम करने की पेशकश भी कर दी लेकिन मधुबाला उस फिल्म में किसी कारणवश काम नहीं कर सकी। ज्वारभाटा हिंदी की महत्वपूर्ण फिल्मों में से एक है। इसी फिल्म से अभिनेता दिलीप कुमार ने अपने सिने कैरियर की शरूआत की थी।
   
मधुबाला को फिल्म अभिनेत्री के रूप में पहचान निर्माता निर्देशक केदार शर्मा की वर्ष 1947 मे प्रदर्शित फिल्म "नीलकमल" से मिली। इस फिल्म में उनके अभिनेता थे राजकपूर। नील कमल बतौर अभिनेता राजकपूर की पहली फिल्म थी। भले ही फिल्म नीलकमल सफल नहीं रही लेकिन इससे मधुबाला ने बतौर अभिनेत्री अपने सिने कैरियर की शुरूआत कर दी। वर्ष 1949 तक मधुबाला की कई फिल्में प्रदर्शित हुयी लेकिन इनसे उन्हें कुछ खास फायदा नहीं हुआ।
         
वर्ष 1949 में बांबे टॉकीज के बैनर तले बनी निर्माता अशोक कुमार की फिल्म "महल" मधुबाला के सिने कैरियर में महत्वपूर्ण फिल्म साबित हुयी। रहस्य और रोमांच से भरपूर यह फिल्म सुपरहिट रही और इसी के साथ बालीवुड में हॉरर और सस्पेंस फिल्मों के निर्माण का सिलसिला चल पडा। फिल्म की जबरदस्त कामयाबी ने नायिका मधुबाला के साथ ही निर्देशक कमाल अमरोही और गायिका लता मंगेशकर को भी फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित कर दिया।
   
वर्ष 1950 से 1957 तक का वक्त मधुबाला के सिने कैरियर के लिये बुरा साबित हुआ। इस दौरान उनकी कई फिल्में असफल रही। लेकिन वर्ष 1958 मे  फागुन, हावडा ब्रिज, काला पानी तथा चलती का नाम गाडी जैसी फिल्मों की सफलता के बाद मधुबाला एक बार फिर से शोहरत की बुंलदियों तक जा पहुंची। फिल्म हावडा ब्रिज में मधुबाला ने क्लब डांसर की भूमिका अदा करके दर्शकों का मन मोह लिया। इसके साथ ही वर्ष 1958 मे हीं प्रदर्शित फिल्म चलती का नाम गाडी में उन्होंने अपने अभिनय से दर्शकों को हंसाते-हंसाते लोटपोट कर दिया।

मधुबाला का पहला प्यार दिलीप कुमार    

मधुबाला के सिने कैरियर मे उनकी जोडी अभिनेता दिलीप कुमार के साथ काफी पसंद की गयी। फिल्म तराना के निर्माण के दौरान मधुबाला दिलीप कुमार से मोहव्बत करने लगी। उन्होंने अपने ड्रेस डिजाइनर को गुलाब का फूल और एक खत देकर दिलीप कुमार के पास इस संदेश के साथ भेजा कि यदि वह भी उनसे प्यार करते है तो इसे अपने पास रख ले। दिलीप कुमार ने फूल और खत दोनों को सहर्ष स्वीकार कर लिया।

बी आर चोपडा की फिल्म नया दौर में पहले दिलीप कुमार के साथ नायिका की भूमिका के लिये मधुबाला का चयन किया गया और मुंबई में ही इस फिल्म की शूटिंग की जानी थी। लेकिन बाद मे फिल्म के निर्माता को लगा कि इसकी शूटिंग भोपाल में भी जरूरी है।
     
मधुबाला के पिता अताउल्लाह खान ने बेटी को मुंबई से बाहर जाने की इजाजत देने से इंकार कर दिया। उन्हें लगा कि मुंबई से बाहर जाने पर मधुबाला और दिलीप कुमार के बीच का प्यार परवान चढे़गा और वह इसके लिए राजी नहीं थे। बाद मे बी आर चोपडा को मधुबाला की जगह वैजयंतीमाला को लेना पडा। अताउल्लाह खान बाद में इस मामले को अदालत में ले गये और इसके बाद उन्होंने मधुबाला को दिलीप कुमार के साथ काम करने से मना कर दिया। यहीं से दिलीप कुमार और मधुबाला की जोडी अलग हो गयी।

मधुबाला का बीमारी में भी काम करना       

पचास के दशक मे स्वास्थ्य परीक्षण के दौरान मधुबाला को एहसास हुआ कि वह हृदय की बीमारी से ग्रसित हो चुकी हैं। इस दौरान उनकी कई फिल्में निर्माण के दौर में थी। मधुबाला को लगा यदि उनकी बीमारी के बारे मे फिल्म इंडस्ट्री को पता चल जायेगा तो इससे फिल्म निर्माता को नुकसान होगा। इसलिये उन्होंने यह बात किसी को नहीं बतायी। उन दिनों मधुबाला के आसिफ की फिल्म मुगले आजम की शूटिंग में व्यस्त थी। मधुबाला की तबीयत काफी खराब रहा करती थी। मधुबाला अपनी नफासत और नजाकत को कायम रखने के लिये घर में उबले पानी के सिवाय कुछ नहीं पीती थी। उन्हें जैसमेलर के रेगिस्तान में कुंए और पोखरे का गंदा पानी तक पीना पडा। मधुबाला के शरीर पर असली लोहे की जंजीर भी लादी गयी लेकिन उन्होंने उफ तक नहीं की और फिल्म की शूटिंग जारी रखी। मधुबाला का मानना था कि अनारकली के किरदार को निभाने का मौका बार बार नहीं मिलता।

तो ऐसी थी खूबसूरती की मल्लिका मधुबाला। जिन्होंने बहुत सी बेहतरीन फिल्मों में काम किया और शोहरत हासिल की। लेकिन व्यक्तिगत जिदंगी में प्यार और अपनेपन के लिए मायूस ही रही। 

Sunday, December 21, 2014

अरे! पूनम ये क्या कह दिया

फिल्म ट्रिप टू भानगढ़ के लिए टॉपलेस पोस्टर से चर्चाओं में आने वाली पूनम पांडे ने एक मुलाकात में यह कहकर एक नई बहस छेड़ दी कि दिल्ली की लड़कियां बिंदास तो हैं लेकिन अपना स्टैडंर्ड मेंटेन करने में फिसड्डी हैं। जबकि मुंबई की लड़कियां फैशन और स्टैडंर्ड मेंटेन में अव्वल हैं।



पूनम यहीं नहीं रुकती वो फिल्म प्रमोशन के दौरान राखी सांवत की मॉडल दोस्त के द्वारा प्रॉडयूसर को स्टेज पर थप्पड़ मारने की घटना पर चुटकी लेते हुए कहती हैं कि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि पूनम पांडे अपनी अगली फिल्म युवा से किस तरह से सुर्खियां बटोरने की कोशिश करेगी। 

Thursday, December 18, 2014

युवा मुझे बतौर एक्टर पहचान दिलाएगी: मोहित बघेल

अजय शर्मा 
रेड्डी और जय हो जैसी हिट फिल्मों से अपने अभिनय की छाप छोड़ने वाले मोहित बघेल अब युवा फिल्म से बतौर नायक अपनी एक और पारी की शुरुआत करने जा रहे हैं। इस में उनका किरदार सिर्फ कॉमेडियन का नहीं है। वह इसमें ओम पुरी, जिमी शेरगिल, अर्चना पूरनसिंह और पूनम पांडे(ट्रिप टू भानगढ़) के साथ बतौर नायक वाले किरदार में पर्दें पर होंगे। इस मूवी में उन्होनें युवा सलमान खान के किरदार को निभाया है। मोहित और पूनम ने एक बातचीत में बताया कि यह एक सोशल ड्रामा फिल्म है, जिसमें युवाओं को जिदंगी को बहुत ही करीब से दिखाने की कोशिश की है। इसमें हमारे समाज में तेजी फैलते बलात्कार जैसे अपराध को भी उठाया गया है।

युवा जसबीर भाटी निर्देशित फिल्म है। यह पांच्‍ा नौजवानों की कहानी है। जिसमें से एक किरदार मोहित ने निभाया है। जो अपनी टीचर से एक तरफा प्यार करता है। लेकिन दूसरी तरफ मोहित यह भी कहते हैं कि इस फिल्म में वह बॉलीवुड के दबंग सलमान खान की उस जिदंगी को पर्दे पर जीवंत करते नजर आएंगे। जिसमें उनके जीवन में कोई भी लड़की रुकती नहीं है, लड़कियां आती हैं और सीढि़यों की तरह इस्तेमाल करके चली जाती हैं। और वह हर बार अकेला रह जाता है। मोहित हंसते हुए कहते हैं कि जब फिल्म देखेंगे जो पाएंगे कि चारों कलाकारों के पास उनकी गर्लफ्रेंड हैं लेकिन मेरी कोई नहीं हैं। मोहित कहते हैं कि वह गोविंदा के जबरदस्त फैन हैं और अच्छे इंसान के बतौर वह सलमान खान को पसंद करते हैं।

युवा की एक्ट्रेस पूनम ने अपने किरदार के बारे में कुछ यूं इस तरह बताया कि वह इसमें यह कहती नजर आएगी कि आदमी की हैसियत का पता उसके जूतों से चलता है। जिसकी वजह से उनका सह कलाकार उनको इंप्रेस करने के लिए अपने जूते चमकाता रहता है। पूनम अपनी इस फिल्म को लेकर काफी उत्साहित हैं।

Thursday, December 11, 2014

AJ MEDIA HOUSE

AJ MEDIA HOUSE
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