Saturday, March 23, 2019

केसरी की दहाड़ रही फीकी

एक गोरे ने मुझसे कहा था कि तुम गुलाम हो, हिंदुस्तान की धरती से डरपोक पैदा होते हैं। आज जवाब देने का वक्त आ गया है - हविलदार ईशर सिंह (अक्षय कुमार) ऐसा अपने साथी जवानों से कहता है जब सामने लगभग 10 हज़ार की अफगानी फौज सारागढ़ी के किले पर कूच करने के लिए आगे बढ़ रही होती है।  इस माहौल में जितनी टेंशन होनी चाहिए वो नज़र आती है और आपको महसूस भी होती है लेकिन दुख की बात ये है कि केसरी में ऐसे भावनाओं से भरे हुए सीन  बहुत कम है.

बहरहाल, अब बात फिल्म की। हवलदार ईशर सिंह (अक्षय कुमार) और उसका साथी गुलाब सिंह (विक्रम कोचर) नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रांत के गुलिस्तान फोर्ट में तैनात है, जो अफगानिस्तान और भारत की सीमा पर स्थित है। इस फोर्ट पर कब्जा करने के लिए समय-समय पर अफगान धावा बोलते रहते हैं, लेकिन हर बार नाकाम हो जाते हैं। एक दिन सीमा पार एक मौलवी (राकेश चतुर्वेदी) के नेतृत्व में कुछ अफगान एक औरत (तोरांज केवोन) को मौत की सजा दे रहे हैं, क्योंकि वह अपने पति को छोड़ कर भागने की कोशिश करती है। ईशर सिंह से यह देखा नहीं जाता है और वह अपने अंग्रेज अफसर के आदेश की अवहेलना करके उस औरत की रक्षा करता है। इस बेअदबी की वजह से उसका ट्रांसफर सारागढ़ी कर दिया जाता है। सारागढ़ी फोर्ट का इस्तेमाल गुलिस्तान फोर्ट और लोकार्ट पोस्ट के बीच संपर्क पोस्ट के रूप में किया जाता है। ईशर सारागढ़ी आकर पोस्ट के इंचार्ज का कार्यभार संभालता है। उधर ईशर के कारनामे से भड़का मौलवी अफगान सरदारों गुल बादशाह खान (अश्वत्थ भट्ट) और खान मसूद (मीर सरवर) को एक साथ मिल कर सारागढ़ी, गुलिस्तान और लोकार्ट फोर्ट पर हमला करने के लिए तैयार कर लेता है। 12 सितंबर 1897 को दस हजार से ज्यादा अफगान सारागढ़ी पहुंच जाते हैं और सिख सैनिकों से सरेंडर करने के लिए कहते हैं। सहायता के लिए सारागढ़ी से लोकार्ट संदेश भेजा जाता है, लेकिन 36 सिख बटालियन को तत्काल सहायता नहीं मिल पाती। फिर ईशर सिंह के नेतृत्व में सिख सिपाही आखिरी दम तक लड़ने का फैसला करते हैं। ईशर सिंह अपनी पुरानी पगड़ी उतार कर केसरी पगड़ी पहन लेता है, क्योंकि केसरी शौर्य का प्रतीक है।

फिल्म की स्क्रिप्ट बहुत अच्छी तरह से लिखी गई है। इस पर काफी शोध किया गया है। एक पोस्ट से दूसरे पोस्ट तक संदेश भेजने के लिए जिस पद्धति का इस्तेमाल किया गया है, वह प्रामाणिक लगता है। लेखक गिरीश कोहली और निर्देशक अनुराग सिंह ने हर पात्र को उभरने का पूरा मौका दिया है। किरदारों को अच्छी तरह से गढ़ा गया है। कहानी में शौर्य के साथ भावनाओं को इस तरह बुना गया है कि वह दर्शकों के दिलों में घर कर जाती है। इस फिल्म में हल्के-फुल्के क्षण भी हैं, जो एकरसता को तोड़ते हैं और गुदगुदाते हैं। हालांकि फिल्म में कुछ चीजें अस्वाभाविक भी लगती हैं, पर अखरती नहीं हैं। अक्षय कुमार के कुछ एक्शन दृश्यों में ह्यबॉलीवुडिया शैलीह्ण की छाप साफतौर पर दिखती है।

 इस फिल्म की एक और खासियत है कि इसमें कहीं भी दो सांप्रदायिक वैमनस्य की बात नहीं की गई है। निर्देशक संतुलित अंदाज में अपनी बात को कहने में सफल रहे हैं। हालांकि इस ऐतिहासिक फिल्म में सिनेमाई छूट ली गई है, फिर भी सारागढ़ी की लड़ाई का चित्रण प्रामाणिक लगता है।

गीत-संगीत, सेट, बैकग्राउंड संगीत, संवाद बिल्कुल फिल्म के मिजाज के मुताबिक हैं। बैकग्राउंड में जब गुरुगोविंद सिंह द्वारा रचित ह्यदे वर मोहे शिवा निश्चय कर अपनी जीत करूंह्ण बजता है, तो थियेटर में एक अलग तरह का वातावरण निर्मित हो जाता है। फिल्म की सिनमेटोग्राफी शानदार है। हालांकि फिल्म की लंबाई थोड़ी कम रखी जा सकती थी। निर्देशक अनुराग सिंह पंजाबी फिल्मों का बड़ा नाम हैं। उन्होंने पंजाबी में ह्यपंजाब 1984ह्ण और ह्यजट्ट एंड जूलियटह्ण सिरीज जैसी बड़ी हिट फिल्में निर्देशित की हैं। वह हिन्दी में भी ह्यरकीबह्ण (2007) और ह्यदिल बोले हड़ीप्पाह्ण (2009) जैसी अति साधारण और असफल फिल्में निर्देशित कर चुके हैं। लेकिन वे बतौर निर्देशक ह्यकेसरीह्ण में एक अलग छाप छोड़ते हैं।

अक्षय कुमार का अभिनय बेहतरीन हैं। उनका गेटअप भी शानदार है। वे पूरी तरह ईशर सिंह लगते हैं। वैसे गेटअप सारे किरदारों का बढ़िया है। यह अक्षय का अब तक का सबसे बढ़िया अभिनय है। मौलवी के रूप में राकेश चतुर्वेदी का अभिनय भी याद रह जाता है। फिल्म में जितने भी और कलाकार हैं, वह भी अपने किरदारों के साथ न्याय करते हैं। ह्यकेसरीह्ण को देखने के बाद जब हम सिनेमाहॉल से बाहर निकलते हैं, तो जेहन में अनायास ही ये पंक्तियां गूंजने लगती हैं- ह्यसूरा सो पहचानिए, जो लड़े दीन के हेत/ पुर्जा पुर्जा कट मरे कबहुं न छाड़े खेतह्ण। निश्चित रूप से यह फिल्म अपनी बात दर्शकों तक पहुंचाने में कामयाब है। एक कालजयी गाथा पर बनी यह फिल्म सिनेमाई श्रेष्ठता की दृष्टि से भले एक कालजयी फिल्म न हो, लेकिन उत्कृष्ट जरूर है। सिनेमा में अगर आपकी ज्यादा रुचि न हो, तो भी आपको यह फिल्म देखनी चाहिए।

Tuesday, February 19, 2019

film review: एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा

फिल्म: एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा

निर्देशक: शैली चोपड़ा धर

कलाकार: अनिल कपूर, राजकुमार राव, सोनम कपूर, जुही चावला, बृजेंद्र काला, सीमा पाहवा

* 2.5 स्टार

आज से 25 साल पहले रिलीज हुई ‘1942 ए लव स्टोरी’ में ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ गाना अनिल कपूर ने मनीषा कोइराला के लिए गाया था। ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ में वो गाना सोनम कपूर अपनी प्रेमिका रेजिना कसांद्रा के लिए गाती हैं। गाने के संदर्भ में यह परिवर्तन इन 25 सालों में हमारे समाज और सिनेमा के बदलाव का भी थोड़ा-बहुत संकेत देता है। हालांकि कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो समलैंगिकता को अभी भी समाज और सिनेमा दोनों में स्वीकार नहीं किया गया है, लेकिन अब अपराध भी नहीं है। पहले इस पर बात करना भी उचित नहीं समझा जाता था, लेकिन अब इस पर बात हो रही है।  और बात निकली है, तो शायद दूर तलक पहुंचे।

 कहानी...

मोगा, पंजाब के मुकेश अंबानी यानी चौधरी बलविंदर सिंह (अनिल कपूर) का गारमेंट का कारोबार है। वह एक शादी में दिल्ली में आते हैं, जहां उनकी बेटी स्वीटी की मुलाकात कुहू (रेजिना कसांद्रा) से होती है। साहिल मिर्जा (राजकुमार राव) एक नाटक लेखक है, जिसके नाटक किसी को पसंद नहीं आते। उसके पिता (कंवलजीत) एक मशहूर फिल्म निर्माता हैं। उनकी एक फिल्म भी साहिल ने लिखी थी, जो बुरी तरह फ्लॉप हुई। लेकिन साहिल प्ले लिखना नहीं छोड़ता।

एक दिन दिल्ली में साहिल के लिखे एक नाटक की रिहर्सल चल रही होती है। तभी अपने भाई से छुपती हुई स्वीटी वहां पहुंचती है। साहिल उसकी मदद करता है। स्वीटी उसे पसंद आ जाती है और वह उसका पता लगाने के लिए मोगा पहुंच जाता है। इस काम में उसकी मदद करती हैं छतरू जी (जूही चावला), जो हैं तो कैटरर, लेकिन उनका शौक है एक्टिंग करना। छतरू जी के साथ साहिल मोगा पहुंचता है और स्वीटी से मिलने में कामयाब भी हो जाता है, लेकिन तभी उसकी कहानी में सियापा आ जाता है। उस सियापे को ठीक करने के लिए वह एक नाटक का मंचन करने की योजना बनाता है, ताकि चीजें ठीक हो जाएं।

डायरेक्शन...

यह विधु विनोद चोपड़ा की बहन शैली चोपड़ा धर की पहली फिल्म है और उन्होंने अपनी पहली फिल्म के लिए एक संवेदनशील विषय को चुना है। उन्होंने इस विषय को रोचक तरीके से पेश किया है। उन्होंने लेस्बियन संबंधों के लिए थोड़ा भी भोंडापन का सहारा नहीं लिया। कोई गरमागरम सीन नहीं डाले हैं, कोई द्विअर्थी संवाद नहीं ठूंसा है, जो यह साबित करता है कि वह अपनी बात वाकई गंभीरता से कहना चाहती थीं।

गजल धालीवाल का लेखन ठीक है। हालांकि पटकथा में थोड़ी सुधार की गुंजाइश थी, फिल्म के संवाद सीन के जरूरत के अनुसार हैं। उनमें चुटीलापन भी है और संजीदगी भी। हालांकि कहीं कहीं नाटकीयता थोड़ी ज्यादा है, खासकर क्लाईमैक्स में, जो फिल्म को कुछ हल्का कर देता है। गीत-संगीत साधारण है। साथ ही गाने कुछ जगहों पर फिल्म के प्रवाह को बाधित भी करते हैं। कोई संजीदा बात चल रही होती है कि अचानक गाना शुरू हो जाता है। फिल्म की सिनेमेटोग्राफी और एडिटिंग ठीक है। इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी है कि यह बिना किसी एक्टिविज्म, बिना किसी वाद के, अपनी बात स्पष्टता के साथ दर्शकों तक पहुंचा देती है। समलैंगिकों की भावनाओं को संवेदनशील तरीके से पेश करती है, रुलाती है, हंसाती है और असर भी पैदा करती है। कई सिनेमाई कमियों के बावजूद यह फिल्म अपनी तरह से नई जमीन छूती है।

एक्टिंग...

फिल्म की स्टारकास्ट इसका सशक्त पक्ष है। हर कलाकार अपने किरदार में फिट नजर आता है और सबको उचित स्पेस भी मिला है। सोनम कपूर का अभिनय अच्छा है। वह काफी हद तक अपने किरदार को उभार पाने में सफल हैं। अनिल कपूर बॉलीवुड के सबसे अच्छे अभिनेताओं में से हैं। उनका अभिनय शानदार है। पिता-पुत्री के रूप में उनकी और सोनम की केमिस्ट्री फिल्म में महसूस की जा सकती है। चाहे कॉमेडी वाले दृश्य हों या भावुकता वाले, वह अभिभूत कर देते हैं। राजकुमार राव का काम कमाल का है। वह फिल्म दर फिल्म खुद को चुनौती दे रहे हैं। अपने किरदार का हर पक्ष वह इतनी सहजता से जीते हैं कि मुंह से अनायास ही वाह निकल जाता है।

जूही चावला बहुत स्वीट लगती हैं। छतरू जी के किरदार के लिए जो बॉडी लैंग्वेज, जैसी संवाद अदायगी चाहिए थी, वह उनके अभिनय में दिखता है। फिल्म में उनका हर बात पर ‘माइंड शैटरिंग’ कहना ‘माइंड ब्लोइंग’ लगता है। बृजेंद्र काला और सीमा पाहवा के किरदार मजेदार हैं और दोनों फिल्म में कुछ हल्के-फुल्के क्षण लेकर आते हैं। स्वीटी के भाई बबलू के रूप में अभिषेक दुहान का अभिनय अच्छा है। उन्होंने एक भाई की स्वाभाविक दुविधा, गुस्से को स्वाभाविक तरीके से पेश किया है।

देखें या न देखें...

हो सकता है कि यह फिल्म समलैंगिता को नापसंद करने वाले, स्वीकार नहीं कर पाने वाले बहुसंख्यक लोगों को अपने पक्ष में न खड़ा कर सके, लेकिन उन्हें कुछ देर के लिए ही सही, ‘न्यूट्रल’ तो करती है। साल की शुरुआत में इस तरह की फिल्म का आना यह भी जताता है कि नई पीढ़ी धीरे ही सही, बदलावों के लिए अपने को तैयार कर रही है।